रविवार, 24 अगस्त 2014

हम है साहित्य '' जगत के राही ॥

रुकती नहीं कलम है
चुकती नहीं है स्याही
हम है साहित्य ''
जगत के राही
जहाँ रवि पहुंच सके
कल्पना हमारी जाती है
ढूँढ के कविता ,,
कलम बनाती है
रचनात्मक शब्दों से भरी है
जीवन की मेरे सुराही
हम है साहित्य ''
जगत के राही
प्राकृतिक छटा काली घटा 
नदिया झील तालाबों में
मै शब्दों का सृजन करता
सोते जागते ख्वाबो में
इतना बड़ा कवि नहीं मै
बस छोटा एक सिपाही
हम है साहित्य ''

जगत के राही