रुकती नहीं कलम है ॥
चुकती नहीं है स्याही ॥
हम है साहित्य ''
जगत के राही ॥ २
जहाँ रवि न पहुंच सके ॥
कल्पना हमारी जाती है ॥
ढूँढ के कविता ,,
कलम बनाती है ॥
रचनात्मक शब्दों से भरी है ॥
जीवन की मेरे सुराही ॥
हम है साहित्य ''
जगत के राही ॥ २
प्राकृतिक छटा काली घटा ॥
नदिया झील तालाबों में ॥
मै शब्दों का सृजन करता ॥
सोते जागते ख्वाबो में ॥
इतना बड़ा कवि नहीं मै ॥
बस छोटा एक सिपाही ॥
हम है साहित्य ''
जगत के राही ॥ २