सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

aasik

पहली बार देखा सुगन्धित कली ॥
जिसे देख कर मै दीवाना हुआ हूँ ॥
ख्यालो में उसके खोया हूँ रहता ॥
आँखों के उसके निशाना  बना हूँ ॥
समझती है पागल दुत्कार देती ॥
फिर भी सुरो का तराना बना हूँ ॥
बहकती बहुत है चहकती बहुत है ॥
दिवानो के महफ़िल का गाना बना हूँ ॥
धड़कने दिल की हमको बताती ॥
अय्यास आशिक बेगाना बना हूँ ॥
पहली बार देखा सुगन्धित कली ॥
जिसे देख कर मै दीवाना हुआ हूँ ॥
ख्यालो में उसके खोया हूँ रहता ॥
आँखों के उसके निशाना  बना हूँ ॥ 

prasannata

रुकती नहीं कलम है ॥
जब भी जिधर चलाता हूँ ॥
रचती अनेको रचना ॥
मन को भी बहलाता हूँ ॥
लोगो की वाह वाही ॥
हौसला बढ़ाती है ॥
शब्दो की लय से ॥
कविता को बनाता हूँ ॥
अभी सारे अरमान सूखे पड़े है ॥
बे मतलब की स्याही को ॥
लिख के बहाता हूँ ॥ 

daga dee

बड़ी भूल कर दी ॥
दिल में बसा के ॥
तुमने तो दिल में ॥
खंजर चला दी ॥
सजाया था ख्वाबो में ॥
सुन्दर सी बगिया ॥
तुमने तो बागो को ॥
बंजर  बना दी ॥
मेरे हुस्न की खूब ॥
तारीफ़ करके ॥
संग में सिमट कर ॥
तुमने दागा दी ॥
लगा दाग चूनर में ॥
कैसे मिटाऊ ॥
तुमने तो हमको ॥
कलंकित बना दी ॥
बातो में फंस कर ॥
हमने तुम्हारे ॥
दिल में क्यों अपने ॥
तुमको जगह दी ॥
कौन बड़ी गलती ॥
किया हमने जानम ॥
तूने क्यों महगी ॥
हमको सजा दी ॥ 

लौट के फिर न आने वाले ॥

पूर्व दिशा को जाने वाले ॥
देख कर मुस्काने वाले ॥
मन का मीत बनाने वाले ॥
आँखों से ललचाने वाले ॥
अपना नाम बता के जाना
लौट के  फिर न आने वाले ॥
हा कहने पर रुकने वाले ॥
न कहने पर झुकने वाले ॥
हंस देने पर खिलने वाले ॥
रो देने पर हिलने वाले ॥
पहिचान बता के अपनी जाना ॥
लौट के फिर न आने वाले ॥
अम्बर से तारे लाने वाले ॥
ख्वाबो का चमन सजाने वाले ॥
दिल की बात बताने वाले ॥
रूप देख हरषाने वाले ॥
अपना पता बता के जाना ॥
लौट के फिर न आने वाले ॥



रविवार, 16 फ़रवरी 2014

kavita

कविता निखर जाती है ॥
देख के रूप तुम्हारा ॥
कलम नहीं रोक पाता ॥
सौंदर्य का बखान कर के ॥
लेखनी मचल जाती है ॥
लगता है तुम्हारे रूप से ॥
पहिचान की सुगंध ॥
बन के पुरवायी ॥
मन आनंद कर जाती है ॥
होठ मुस्काने लगते ॥
आँखे मचलती है ॥
यौवन की मधुर बेला में ॥
यादे आ जाती है ॥

DIL NADAN

समझ नहीं पाता हूँ ॥
दिल की जुबान को ॥
कैसे तुम्हे बताऊ ॥
तुम्हारे निशान को ॥
लगता डर हमे ॥
नाराज न हो जाओ ॥
मेरी तस्वीर ले के ॥
तहलका न मचाओ ॥
तुम्ही हमें बता दो ॥
मेरे ईमान को ॥
बदनाम नही करूगा ॥
तुम्हारे नाम को ॥
बचपन से जवानी की ॥
कहानी पढ़ लिया हूँ ॥
महकती काली ओ तुम हो ॥
तुमसे मिल लिया हूँ ॥
अपना तो अब समझ लो ॥
आशिक नादान को ॥

dil nadan

समझ नहीं पाता हूँ ॥
दिल की जुबान को ॥
कैसे तुम्हे बताऊ ॥
तुम्हारे निशान को ॥
लगता डर हमे ॥
नाराज न हो जाओ ॥
मेरी तस्वीर ले के ॥
तहलका न मचाओ ॥
तुम्ही हमें बता दो ॥
मेरे ईमान को ॥
बदनाम नही करूगा ॥
तुम्हारे नाम को ॥
बचपन से जवानी की ॥
कहानी पढ़ लिया हूँ ॥
महकती काली ओ तुम हो ॥
तुमसे मिल लिया हूँ ॥
अपना तो अब समझ लो ॥
आशिक नादान को ॥

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

सूरज को हंसते जब देखा ॥

सूरज को हंसते जब देखा ॥
तब मन का खिलौना जाग गया ॥
मै दौड़ा जब आरति करने  को ॥
मन मटमैला भाग गया ॥
हंस के फूल भी कहने लगे ॥
अब रवि किरण फैलाया है ॥
गया अँधेरा हुआ सवेरा ॥
दिन दिवाकर लाया है ॥
जब जल से पग को धोने लगा ॥
खुशियो का मौसम नाच गया ॥
मै दौड़ा जब आरति करने  को ॥
मन मटमैला भाग गया ॥
चिड़िया चो चो चो  कहने लगी ॥
समय सुहाना आया है ॥
कलियो पर भवरे हंस हंस के ॥
जब प्रेम तराना गाया है ॥
मै माला ले पहनाने लगा ॥
खुद भाग्य भी मेरा जाग गया ॥
मै दौड़ा जब आरति करने  को ॥
मन मटमैला भाग गया ॥

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

samay kat gaya

बात करते करते ॥
सफ़र कट गया ॥
नाम भी न बताया ॥
गमन कर गया ॥
जा रही थी सुबह ॥
सीधे बागो  में मै ॥
रास्ते में अनोखा ॥
युवक मिल गया ॥
नाम भी न बताया ॥
गमन कर गया ॥
सुन्दर सुरति को ॥
निहारती रही ॥
सारे रास्ते में गुण को ॥
ताड़ती रही ॥
लगा पत्थर पे मानो ॥
कमल खिल गया ॥
नाम भी न बताया ॥
गमन कर गया ॥
बात करते थे अच्छी ॥
बनावट न थी ॥
उनकी बातो को सुन ॥
खूब हंसती रही ॥
मुझको ऐसा लगा की ॥
जहाँ मिल गया ॥
मेरे बालो को सहला के ॥
बोले यूं थे ॥
उनकी हर एक अदा पे ॥
मचलती रही ॥
मुझको ताज्जुब हुआ ॥
मै समझने लगी ॥
मेरी आँखों का जादू ॥
असर कर गया ॥
नाम भी न बताया ॥
गमन कर गया ॥ 

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

अब इतना भी तुमको पड़ेगा ॥ जिगर चीर कर के दिखाना पड़ेगा ॥

अब इतना भी तुमको  पड़ेगा ॥
जिगर चीर कर के दिखाना पड़ेगा ॥
तभी शायद तुमको विशवास होगा ॥
मुहब्बत की महफ़िल सजाना पड़ेगा ॥
जब दिलदार का दिल लहू में सने गा ॥
अभी तो तसल्ली तुमको मिलेगी ॥
है प्यार क्या चीज हम भी देखे ॥
भले जान दे कर गुजरना पड़ेगा ॥
तभी शायद तुमको विशवास होगा ॥
मुहब्बत की महफ़िल सजाना पड़ेगा ॥
होश में हूँ य खामोश मौसम बना ॥
अब तो खंजर उठा कर के मारूँगा मै ॥
दिल्लगी क्या है दिल से पूछता हूँ ॥
अपने सीने से बाहर निकालू गा मै ॥
मुझे भी पता है यही अंत है ॥
जान दे कर मुझे भी बिछड़ना पड़ेगा ॥
तभी शायद तुमको विशवास होगा ॥
मुहब्बत की महफ़िल सजाना पड़ेगा ॥

basabt

नैन मटक्का कर रहे है ॥
भवरे आय के बाग़ में ॥
भर कर अपनी बाहो में ॥
रात कली तू जाग रे ॥
मै  तेरा रसपान करूगा ॥
दिल की बताऊगा ॥
सारी रात संग रहूगा ॥
सुबह होते उड़ जाऊगा ॥
तेरे कारण हुआ कलूटा ॥
यही हमारी भाग्य रे ।।
भर कर अपनी बाहो में ॥
रात कली तू जाग रे ॥
तू भी मेरे स्वागत में ॥
सारी महक लुटाएगी ॥
सात स्वरो का साज सजा के ॥
प्रेम गीत को गायेगी ॥
कोई हानि तुम्हे नहीं होगी ॥
न आयेगी आंच रे ॥
भर कर अपनी बाहो में ॥
रात कली तू जाग रे ॥ 

basant

आते बसंत मस्त कालिया खिली है ॥
यौवन भी इजहार करने लगा है ॥
बहती हवा जब जब आनंद आता ॥
मधुमाश मचलने लगा है ॥
सिंगार करके जब मुस्काती ॥
अनोखी आभा से आँखे लजाती ॥
मन भी मगन हो उमड़ने लगा है ॥
अम्बर से धरती तक मोहक अदा है ॥
आते बसंत मस्त कालिया खिली है ॥
यौवन भी इजहार करने लगा है ॥
बहती हवा जब जब आनंद आता ॥
मधुमाश मचलने लगा है ॥ 

basant

मधुर मधुर बहती हवाये ॥
छोड़ रही संवाद ॥
प्रकृति छटा विखेर रही ॥
आया है मधुमाश ॥
आया है अनोखा मास ॥
उमगे उड़ रही है ॥
भवरा गीत सुनाता ॥
कालिया खिल रही है ॥
महक रही है क्यारी ॥
मच रहा उल्लास ॥
सजी बसंती मचल रही है ॥
होगा अब उत्पात ॥
मधुर मधुर बहती हवाये ॥
छोड़ रही संवाद ॥
प्रकृति छटा विखेर रही ॥
आया है मधुमाश ॥

शम्भू नाथ