मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

अल्फाज तुम्हारे अच्छे है ॥
तुम भी हमको भाते हो ॥
रात जगाने आशिक़ बनके ॥
प्रीतम रोज क्यों आते हो ॥
निखरा चेहरा देख हमारा ॥
क्यों मगन मधुर मुस्काते हो ॥
हाथ पकड़ के हाथ का कंगन ॥
प्रीतम प्रिये बजाते हो ॥
मस्त मगन हो जब हंसती हूँ ॥
यार बहुत सकुचाते हो ॥

man magan

इस रूप की क्या तारीफ करू ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.
आँख तुम्हारी करे शरारत ॥
होठ मंद मुस्काये ॥
हे हुस्न कली तू इठला करके ॥
पास नहीं क्यूँ आये ॥
रूप रशिक मै बन बैठा हूँ ॥
दिलवा का जो जतन हुआ है ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २. 

kavivar

(आप  को समर्पित )
मै पूछता हूँ कविवर ॥
कविता कैसे बनाते हो ?
शब्दों का सिंगार करके ॥
कविता को सजाते हो ॥
आकर्षण शब्द लिख कर ॥
कविता को रचाते हो ॥
भयानक सोच की महोदय ॥
कविता जब सुनाते हो ॥
सोलह सिंगार करके ॥
कविता जब मुस्कुराती है ॥
तालिया बजती रहती है ॥
मोहिनी बलखाती है ॥
काल्पनिक सोच के आदी ॥
जनाब नजर आते हो ॥