शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

अभी हजारो पोल खुलेगी ॥
लाखो होंगे बेनकाब ॥
भ्रष्टाचार में लिप्त है जितने ॥
उनका चिल्लायेगा पाप ॥
बैंक हँसेगी रोयेगी तिजोरी ॥
मंद पड़ेगी चोरी छिछोरी ॥
मुँह छिपा के जेल जायेगी ॥
जो किये है बढ़ के घात ॥
भ्रष्टाचार में लिप्त है जितने ॥
उनका चिल्लायेगा पाप ॥
रोजी छूटेगी किस्मत फूटेगी ॥
उनके घर में लगेगी  आग ॥
डर जायेगे कुछ पिछलग्गू ॥
कुछ देंगे बुराई त्याग ॥
भ्रष्टाचार में लिप्त है जितने ॥
उनका चिल्लायेगा पाप ॥


रविवार, 7 जून 2015

shiksha

ज्ञान के खातिर करो तपस्या ॥
गुरुजनो से मांगो भीख ॥
संस्कारी इंसान बनो ॥
यही हमारे कुल की रीति॥
 सूर्योदय से पहले उठ जाओ ॥
शुभ प्रभात देता बक्शीस ॥
संस्कारी इंसान बनो ॥
यही हमारे कुल की रीति॥
आदर सूचक शब्दों को बोलो ॥
लो बड़ो से हरदम सीख ॥
संस्कारी इंसान बनो ॥
यही हमारे कुल की रीति॥ 

गुरुवार, 4 जून 2015

दिल का लिफाफा खोल के देखो ॥
दिलदार तुम्हे मिल जायेगा ॥
नजरे मिलाते लगेगा झटका ॥
तन तरुवर हिल जायेगा ॥
मंद हवाये चलने लगेगी ॥
जब यार खड़ा मुस्कायेगा ॥
पुष्प झरेगे अम्बर से ॥
तब सावन ऊधम मचायेगा ॥

बुधवार, 3 जून 2015

नजरो का जादू

नजरो का जादू चलाओ न ॥
मुझपर ॥
पहले से मै तो शादी शुदा हूँ ॥
बीबी भी सुन्दर बच्चे अनोखे ॥
ख्वाबो को उनके सजाने जुटा हूँ ॥
किसी और पर जा के ॥
डालो तुम डोरे ॥
मिली जो मुझे है मै उसपर ॥
फ़िदा हूँ ॥ 

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

strag

चलती रहे कलम यही दुआ ॥
कीजियेगा ॥
रचना को रचते हम भी ॥
चले जायेगे ॥
मेरे जैसे कम लोग इस ॥
युग में आयेगे ॥
नाम हो जग में यही ॥
कामना है ॥
सामने संघर्ष से मेरा ॥
सामना है ॥
जीवन के रहस्य को ॥
बताते जायेगे ॥
मेरे जैसे कम लोग इस ॥
युग में आयेगे ॥
खुशियो को बुला के ॥
मंडप सजायेंगे ॥
लिखे हुए गीत मेरे लोग ॥
गायेगे ॥
मेरे जैसे कम लोग इस ॥
युग में आयेगे ॥


शम्भू नाथ

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

अल्फाज तुम्हारे अच्छे है ॥
तुम भी हमको भाते हो ॥
रात जगाने आशिक़ बनके ॥
प्रीतम रोज क्यों आते हो ॥
निखरा चेहरा देख हमारा ॥
क्यों मगन मधुर मुस्काते हो ॥
हाथ पकड़ के हाथ का कंगन ॥
प्रीतम प्रिये बजाते हो ॥
मस्त मगन हो जब हंसती हूँ ॥
यार बहुत सकुचाते हो ॥

man magan

इस रूप की क्या तारीफ करू ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.
आँख तुम्हारी करे शरारत ॥
होठ मंद मुस्काये ॥
हे हुस्न कली तू इठला करके ॥
पास नहीं क्यूँ आये ॥
रूप रशिक मै बन बैठा हूँ ॥
दिलवा का जो जतन हुआ है ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.