इस रूप की क्या तारीफ करू ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.
आँख तुम्हारी करे शरारत ॥
होठ मंद मुस्काये ॥
हे हुस्न कली तू इठला करके ॥
पास नहीं क्यूँ आये ॥
रूप रशिक मै बन बैठा हूँ ॥
दिलवा का जो जतन हुआ है ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.
आँख तुम्हारी करे शरारत ॥
होठ मंद मुस्काये ॥
हे हुस्न कली तू इठला करके ॥
पास नहीं क्यूँ आये ॥
रूप रशिक मै बन बैठा हूँ ॥
दिलवा का जो जतन हुआ है ॥
जिस पर मनवा मगन हुआ है ॥
जब से तुमसे लगन हुआ है || २.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें