
जन जन में जो आस जगी है॥
उसको आप जगाये हो॥
क्या हक़ बनाता है भोली जनता का॥
उसको आप बताये हो॥
खोल दिए हो उस पोटरी को ॥
जिसमे सच्चाई की आशा है॥
जन जन का स्वर एक हुआ है॥
सब की यही अभिलाषा है।
इन बेईमानी दानव के चंगुल से॥
कैसे छूटना है बताये हो॥
भ्रष्टाचार की बू आती है॥
सरे सरकारी संस्थाओ में॥
वे शर्म घोट कर पी गए है॥
जीते है आशाओं में॥
गली गली चौराहे पर तुम॥
सच के फूल उगाये हो..
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें