मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

दारू

अपने भाव विचारों को मै

छिन्न भिन्न कर डाला

प्यारी प्रिया के यादो में मै

पूरी बोतल पी डाला

बहक गए थे पाँव मेरे

जुबान लड़खड़ाने लग गयी

मेरे मन की मर्यादा सब

एक झटके में भग गयी

पूरे सारे मोहल्ले को मै

नशे में गाली दे डाला...

रोक रहे थे लोग मुझे

टोक रहे थे लोग मुझे

शम्भू दारू पीता है

बोल रहे थे लोग मुझे

उस नशा नशीली के चक्कर में

कितनो को थप्पड़ जड़ डाला

मै मतवाला हाथी बन कर

भाग रहा था इधर उधर

कुछ हमें देख कर दर जाते थे

कुछ हो जाते थे तितर बितर

क्रोध तो इतना भड़क गया था

मै मार दिया अफसर पर भाला

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