शनिवार, 10 दिसंबर 2011

रन्नो सन्नो..

गुस्से में तो आप ही लगती हो वह चाँद

जीवन भर आने नहीं दूंगा तुझपे आंच

तुझपे कोई आंच कभी गुस्सा होना

मेरे से छुप छुप कर कभी कोने में रोना

याद करो वे दिन बचपन के यादे

उस बगिया का आम और यादो की बाराते

लुकाछुपी का खेल जिसमे होता था हर्जाना

पत्तो के गहने बेंच कर तू देती थी जुरमाना

इन बातो को भूल कर तू जायेगी जब रन्नो

मर जाएगा मुरझा कर तेरा ये सन्नो

मुझे छोड़ अगर तू कही जायेगी

मेरी याद तुझे बहुत तडपाएगी

तब मुझको करना याद जमाना क्या कहेगा

तुमको तो बेवकूफ मुझे बेमर्द कहेगा

मानो मेरी बात करलो मुझसे शादी

आने वाले फूल की नहीं होगी बर्बादी

लोग जो जलते आज फिर वे देगे साथ

गुस्से में तो आप ही लगती हो वह चाँद॥

जीवन भर आने नहीं दूंगा तुझपे आंच॥

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